पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने भारत-पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए सीजफायर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। गहलोत ने कहा कि पीएम मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन निराशाजनक रहा और देश को अचानक हुए सीजफायर की वजह समझ नहीं आ रही। उन्होंने सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की, साथ ही कई गंभीर सवाल उठाए।
गहलोत ने कहा, “पहलगाम आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। हमारी सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत 100 से अधिक आतंकियों को ढेर कर दुनिया में भारत का परचम लहराया। लेकिन अचानक सीजफायर की घोषणा ने सबको हैरान कर दिया। यह पूरी तरह गोपनीय रहा, और ट्रंप के बयानों ने स्थिति को और जटिल बना दिया।” उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ट्रंप इस मामले में “ठेकेदारी” क्यों कर रहे हैं, और सरकार उनकी मध्यस्थता पर चुप्पी क्यों साधे हुए है?
गहलोत ने ट्रंप के उस बयान पर कड़ा ऐतराज जताया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान ने उनके दबाव में सीजफायर किया और वह कश्मीर मुद्दे को भी सुलझाएंगे। गहलोत ने कहा, “भारत की नीति हमेशा से द्विपक्षीय रही है। शिमला समझौते के समय भी हमने किसी तीसरे पक्ष को हस्तक्षेप नहीं करने दिया। लेकिन अब ट्रंप खुलेआम मध्यस्थता की बात कर रहे हैं, और सरकार कोई स्पष्टीकरण नहीं दे रही। यह भारत के स्वाभिमान पर चोट है।”
गहलोत ने पीएम मोदी के “ऑपरेशन सिंदूर को अस्थाई रूप से स्थगित” करने वाले बयान पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “मैंने अपने जीवन में कभी नहीं सुना कि सीजफायर अस्थाई होता है। अगर यह अस्थाई है, तो क्या गारंटी है कि पाकिस्तान फिर से आतंकी गतिविधियां शुरू नहीं करेगा? क्या यह अमेरिकी दबाव का नतीजा है?” उन्होंने मांग की कि सरकार इस पर स्पष्ट जवाब दे।
गहलोत ने जोर देकर कहा कि 11 साल बाद पहली बार देश का पक्ष और विपक्ष एकजुट हुआ। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तारीफ करते हुए कहा, “राहुल गांधी ने न केवल सरकार का साथ देने की बात कही, बल्कि उसे अमल में भी लाया। उनकी चेतावनियां, चाहे कोरोना हो या चीन और अजरबैजान-तुर्की का पाकिस्तान समर्थन, हमेशा सटीक रही हैं।” गहलोत ने सरकार से पूछा कि जब पूरा विपक्ष आतंकवाद के खिलाफ एकजुट है, तो पीएम मोदी सर्वदलीय बैठकों में शामिल क्यों नहीं हो रहे?
गहलोत ने मांग की कि सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहिए, ताकि सीजफायर, पहलगाम हमले, और ट्रंप की मध्यस्थता जैसे मुद्दों पर खुली चर्चा हो। उन्होंने कहा, “देश जानना चाहता है कि पीएम मोदी पर किस तरह का दबाव है कि वे जवाब नहीं दे रहे। मीडिया में सूत्रों के हवाले से खबरें चल रही हैं, लेकिन सरकार को खुद सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।”
गहलोत ने अफसोस जताया कि भारत के पास पाकिस्तान के आतंकवाद को हमेशा के लिए खत्म करने का सुनहरा मौका था। उन्होंने कहा, “हमारी सेना ने शानदार काम किया, लेकिन अचानक सीजफायर ने सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया। अगर सीजफायर करना ही था, तो कम से कम पीएम या विदेश मंत्री स्तर पर बात होनी चाहिए थी, जिसमें पाकिस्तान को आतंकवाद खत्म करने की शर्त माननी पड़ती।”
गहलोत ने केंद्र सरकार पर नैतिक साहस और अधिकार खोने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “अजरबैजान और तुर्की खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़े हैं, लेकिन पहलगाम हमले के बाद भी कोई देश हमारे साथ खुलकर नहीं आया। यह सरकार की कूटनीतिक नाकामी है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को देश को भरोसे में लेना होगा और सीजफायर के पीछे की सच्चाई सामने लानी होगी।
अशोक गहलोत के बयान ने केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। सीजफायर और ट्रंप की मध्यस्थता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देने के लिए सरकार को जल्द ही कदम उठाने होंगे। देश की जनता और विपक्ष अब पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, और यह देखना बाकी है कि सरकार इस चुनौती का सामना कैसे करती है।