खामेनेई की मौत के बाद ईरान में अब आगे क्या? एक्सपर्ट का साफ जवाब
अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है। ईरान ने जवाबी हमलों में इजरायल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और खाड़ी क्षेत्र के कई शहरों पर सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन दागे हैं। दुनिया भर में सवाल उठ रहे हैं, क्या अब ईरान में सत्ता परिवर्तन होगा? क्या अमेरिका इस्लामी शासन को पूरी तरह उखाड़ फेंक पाएगा? इस मुद्दे पर पूर्व भारतीय राजनयिक अचल मल्होत्रा ने स्पष्ट राय दी है: “अमेरिका के बस के बाहर है ये काम…” उनके अनुसार, ईरान में रिजीम चेंज न तो आसान है और न ही अमेरिका या इजरायल के नियंत्रण में।
अचल मल्होत्रा का विश्लेषण: क्यों नहीं संभव आसान सत्ता बदलाव?
पूर्व राजनयिक अचल मल्होत्रा, जो लंबे समय तक भारतीय विदेश सेवा में रहे और विभिन्न देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, ने इस संकट पर गहराई से बात की। उनके मुख्य बिंदु:
- जनता में असंतोष तो है, लेकिन बाहरी हस्तक्षेप नहीं मंजूर: ईरान में आर्थिक संकट, सख्त नीतियां और शासन की कठोरता के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे हैं। लेकिन ईरानी समाज कभी बाहरी ताकत (खासकर अमेरिका) द्वारा तय शासन को स्वीकार नहीं करेगा। “ईरानी जनता खुद अपनी सत्ता चुनना चाहेगी, किसी विदेशी द्वारा थोपी गई व्यवस्था नहीं।”
- कोई विश्वसनीय विकल्प नहीं : अगर मौजूदा धर्म-आधारित शासन अचानक खत्म भी हो जाए, तो राजनीतिक वैक्यूम भरने वाला कोई मजबूत, विश्वसनीय विकल्प नजर नहीं आता। बार-बार चर्चा रजा पहलवी (पूर्व शाह के बेटे) के नाम पर आकर अटक जाती है, लेकिन अमेरिका के अंदर भी इस पर एक राय नहीं है कि उन्हें सत्ता सौंपी जाए।
- बांग्लादेश का उदाहरण: मल्होत्रा ने बांग्लादेश का जिक्र किया, जहां अमेरिका ने मोहम्मद यूनुस को “पैराशूट” करके सत्ता में बिठाया। लेकिन वह प्रयोग सिर्फ 18 महीने चला और फिर सत्यानाश हो गया। ईरान बांग्लादेश नहीं है—यह बड़ा, जटिल और गहराई से संगठित देश है। ऐसा प्रयोग यहां दोहराया नहीं जा सकता।
- ग्राउंड ऑपरेशन की जरूरत, लेकिन जोखिम बहुत: अगर इजरायल, अमेरिका और सहयोगी ईरान में जमीनी सैन्य कार्रवाई करके पूरे इस्लामी ढांचे को नष्ट कर दें, तभी सत्ता परिवर्तन संभव हो सकता है। लेकिन पूर्व राजनयिक को नहीं लगता कि पश्चिमी देश इतने बड़े देश में ग्राउंड ऑपरेशन का जोखिम उठाएंगे।
ईरान का भविष्य: आंतरिक प्रक्रिया या बाहरी दबाव?अचल मल्होत्रा का निष्कर्ष साफ है—ईरान में सत्ता का भविष्य अंततः आंतरिक राजनीतिक प्रक्रियाओं और ईरानी जनता की इच्छा से तय होगा, न कि अमेरिका-इजरायल के सैन्य दबाव से। चाहे हालात कितने तनावपूर्ण हों, बाहरी ताकतें ईरान को “रिजीम चेंज” थोप नहीं पाएंगी।वर्तमान स्थिति: युद्ध का खतरा बढ़ता जा रहा
- ईरान ने खामेनेई की मौत का बदला लेते हुए इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए।
- अमेरिका और इजरायल ने ऑपरेशन जारी रखने की चेतावनी दी है, जिसमें ईरान की सैन्य, परमाणु और नेतृत्व संरचना निशाने पर।
- क्षेत्र में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, हवाई अड्डे-बंदरगाह प्रभावित, और कई देशों में नागरिक प्रभावित हो रहे हैं।
- ईरान में 40 दिनों का शोक घोषित, लेकिन जवाबी कार्रवाई जारी।
यह संकट अब सिर्फ ईरान-इजरायल तक सीमित नहीं—पूरे पश्चिम एशिया में महायुद्ध का खतरा मंडरा रहा है। क्या ईरान में नया नेतृत्व उभरेगा? क्या अमेरिका का “ऑपरेशन” सफल होगा? समय ही बताएगा।अधिक अपडेट के लिए बने रहें!