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भारत के नए ‘AI लेबलिंग’ नियम सोशल मीडिया का खतरा कम कर पाएंगे?

India Ahead Now | Updated on: March 7, 2026 | 1:16 pm

यह सवाल आज के डिजिटल दौर में बहुत प्रासंगिक है, जहां AI से बने डीपफेक, फर्जी वीडियो और मिसइन्फॉर्मेशन हर दिन लाखों लोगों तक पहुंच रहे हैं। फरवरी 2026 में सरकार ने Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Amendment Rules, 2026 नोटिफाई किए, जो IT Rules, 2021 में संशोधन हैं। ये नियम 20 फरवरी 2026 से लागू हो गए हैं।

नए नियम क्या कहते हैं?

सरकार ने पहली बार Synthetically Generated Information (SGI) या AI से उत्पन्न/संशोधित कंटेंट को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है। SGI वह ऑडियो, विजुअल या ऑडियो-विजुअल कंटेंट है जो कंप्यूटर टूल्स से बनाया या बदला गया हो, और जो असली लगे—यानी लोगों या घटनाओं को ऐसे दिखाए कि वे प्राकृतिक लगें।मुख्य प्रावधान:सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स आदि) को SGI कंटेंट पर प्रमुखता से लेबल लगाना अनिवार्य है। विजुअल कंटेंट में विजुअल लेबल और ऑडियो में ऑडियो डिस्क्लोजर होना चाहिए।

जहां तकनीकी रूप से संभव हो, परमानेंट मेटाडेटा या यूनिक आइडेंटिफायर एम्बेड करना होगा, ताकि कंटेंट की उत्पत्ति ट्रेस की जा सके। ये मेटाडेटा छेड़छाड़-प्रूफ होने चाहिए।
यूजर्स को खुद डिक्लेयर करना होगा कि उनका अपलोड किया कंटेंट SGI है या नहीं। बड़े प्लेटफॉर्म्स (5 मिलियन+ यूजर्स वाले) को यूजर डिक्लेरेशन लेना और टेक्निकल वेरिफिकेशन करना होगा।
अवैध SGI (जैसे चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन, फर्जी डॉक्यूमेंट्स, NCII आदि) को रोकने के लिए टेक्निकल उपाय अपनाने होंगे।
टेकडाउन टाइमलाइन को काफी कम कर दिया गया: पहले 24-36 घंटे थे, अब 2-3 घंटे में फ्लैग्ड अनलॉफुल कंटेंट (खासकर AI से जुड़े) हटाना होगा। NCII के लिए 2 घंटे का समय है।

भारत फरवरी 2026 में इनमें सबसे आगे आ गया है।लेकिन क्या ये नियम सोशल मीडिया के खतरों को सचमुच कम कर पाएंगे?एक्सपर्ट्स की चिंता असल में इम्प्लीमेंटेशन पर है।

तकनीकी चुनौतियां: डिटेक्शन टूल्स अभी 100% एक्यूरेट नहीं हैं। वॉटरमार्क या मेटाडेटा को मामूली एडिटिंग से हटाया जा सकता है। अलग-अलग भाषाओं (खासकर हिंदी, क्षेत्रीय भाषाओं) में एक्यूरेसी कम हो सकती है।
क्रिएटिव फ्रीडम का खतरा: व्यंग्य, मीम्स, या अच्छे इरादे से एडिटेड कंटेंट को भी गलती से फ्लैग हो सकता है। ऑटोमैटिक सिस्टम्स से इसे अलग करना मुश्किल।

वार्निंग फटीग: अगर हर जगह लेबल दिखने लगे, तो यूजर्स उन्हें इग्नोर करने लगेंगे। रिसर्च दिखाती है कि बार-बार वॉर्निंग्स का असर कम हो जाता है।
प्लेटफॉर्म्स पर दबाव: सिर्फ 10 दिन का समय मिला था कंप्लायंस के लिए। 2-3 घंटे की टेकडाउन विंडो से ऑटोमेशन पर ज्यादा निर्भरता बढ़ेगी, जिससे गलतियां हो सकती हैं। खेतान एंड कंपनी के पार्टनर सुप्रतिम चक्रवर्ती कहते हैं कि डिटेक्शन टूल्स की कमी और वॉटरमार्क हटाने की आसानी बड़ी समस्या है।
फ्री स्पीच पर असर: ट्राईलीगल के पार्टनर निखिल नरेंद्रन चेतावनी देते हैं कि इतनी कम टाइमलाइन से अपील का मौका कम होगा। यह ‘पहले हटाओ, बाद में अपील करो’ जैसा सिस्टम बन सकता है, जो फ्री स्पीच को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्ष: अच्छी शुरुआत, लेकिन असली परीक्षा बाकीये नए AI लेबलिंग नियम निश्चित रूप से सोशल मीडिया पर फेक कंटेंट के खतरे को कम करने की दिशा में एक मजबूत कदम हैं। वे यूजर्स को बेहतर जानकारी देकर सूचित फैसले लेने में मदद करेंगे और प्लेटफॉर्म्स को ज्यादा जिम्मेदार बनाएंगे। लेकिन सफलता जमीन पर लागू करने पर टिकी है—मजबूत टेक्नोलॉजी, सटीक डिटेक्शन, बैलेंस्ड इंप्लीमेंटेशन और नियमित अपडेट्स के बिना ये सिर्फ कागजी नियम रह सकते हैं।भारत AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ-साथ इसके दुरुपयोग को रोकने में आगे बढ़ रहा है, लेकिन यह लड़ाई लंबी है। क्या ये नियम वाकई सोशल मीडिया को सुरक्षित बनाएंगे? समय बताएगा, लेकिन शुरुआत सकारात्मक जरूर है।